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1- वास्तु देवता का प्राचीन कथा कें अनुसार परिचय क्या है। जाने...

1- वास्तु देवता का प्राचीन कथा कें अनुसार परिचय क्या है। जाने...


प्रचीन दन्तकथा के अनुसार वास्तु की परिभाषा :-एक .बार देवताओं और अषुरो में भयानक युद्ध हुआ जिसमें देवताओं की ओर से भगवान षिव और दैत्यों से अन्धकाषुर सेनापति के रूप में अपनी अपनी सेनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहेl थे, भगवान षिव और अन्धकारसुर के बीच कई बर्षा तक युद्ध चलता रहा, युद्ध के बीच भगवान षिव और दैत्य अन्धकासुर के पसीना की एक बून्द पृथ्वी पर गिरी जिससे एक विषालकाय महामानव का जन्म हुआ, और उसने अपनी भूख की तृप्ति के लिये दैत्यो को खाना चालू कर दिया उसके सामने जो भी आता चाहे वो दैत्य हो या देवता हो वह सभी को अपना आहार बनाता जा रहा था उसे देख कर, दैत्य यह सोचकर डरने लगे कि यह कोई देवता तो नही है। और देवता यह सोच कर डरने लगे कि यह कोई अषुर तो नही है। उसका आकार बढता ही जा रहा था, उसे देखकर देवता भयभीत हो कर ब्रहमा जी के पास गये और उनसे विनति करने लगे कि इससे हमे बचाओं तो ब्रहमा जी ने कहा कि इसे अकेले देवता वस में नही कर सकते है। इसे देव और दानव दोनो मिलकर ही वस में कर सकते है। में इसमें उपर से लात मार कर नीचे गिराउंगा, और यह उल्टा औन्धे मुह पृथ्वी पर गिरेगा उसी समय आप दोनो इस पर बेठ कर इसे दबोच लेना, फिर इसे उठने मत देना तो देवताओं और दानवो ने ऐसा ही किया जेसा ब्रहमा जी ने कहा वे सव उस महादानव पर बेठ गये और इन दोनो की शक्तियों से वषीभूत होकर वह ब्रहमा जी से प्रार्थना करने लगा कि हे ब्रहमा जी मेरा अपराध तो बताये इस तरह से में अपनी तृप्ति केसे कर पाउंगा तो ब्रहमा जी ने उससे कहा तुम पृथ्वी लोक पर ही रहोगे और तुम्हारा नाम वास्तु पुरूश होगा और पृथ्वी पर जो भी मनुष्य अपना घर मकान दुकान बनायेगा तो उस जगह तुम्हारा वास स्वतः ही हो जायेग। जहा भी चार दीवारी होगी उस स्थान पर तुम्हारा वास हो जायेगा और वही लोगो से आप अपना भोग प्रसाद ग्रहण करोगे। तो उस वास्तु पुरूश के उपर 33 देवता व 12 असुर का वास हुआ तो कुल 45 देव और दानवो ने वास्तुपुरूष पर वास किया हुआ हैं तो इसी प्रकार वास्तु पुरूश मंण्डल में हर देवता और दानव का अपना स्वभाव अपना आहार, अपना विचार अपना कर्म व गुणधर्म अलग अलग है। तो जिस पद में आप लम्बे समय से रहते हो तो उस पद के गुण आपके अन्दर जरूर आयेगें। ये दोनो ही अपने गुणधर्म के अनुसार वहा पर रहने बालो को फल देते है। तो इस प्रकार वास्तु पुरूश की उत्पत्ति हुई। ऐसी कथा हमारे शास्त्रो में  हे।


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