ईशIन कोने
1. गुरू :- गुरू की प्रकृति क्या है। गुरू की प्रकृति यह है कि जो हो रहा है वो सव सही हो रहा है। और जो होगा वो भी सही ही होगा और जो हो गया है वो भी सही ही हुआ है। दूसरा गुरू की प्रकृति यह है कि गुरू दूसरों के दुख को देख कर बहुत दुखी हो जाते है यदि किसी को चोट लग गई है तो उसे देख कर इतने दुखी हो जायेगें, चाहे अपने प्लास्टर चढा हुआ हैं उसकी परवाह नही है लेकिन यदि कोई उनका षिष्य किसी परेषानी में उनके पास आ जाये और उनसे अपने दूख को दूर करने की विनती करें तो गुरू भगवान से यह प्रार्थना करते है कि हे भगवान इसका दुख इसका कष्ट इसकी परेषानी मुझे दे दो और इसे ठीक कर दो। तो सच्चे गुरू की बात भगवान को भी सुननी पडती है और माननी पडती है। तो आपने देखा होगा जो सच्चे गुरू हुऐ है वे अपने अन्तिम समय में अनेको बिमारीयों से ग्रसीत हो जाते है। और उन्हे यह मालूम होता है कि यह कष्ट उनका अपना नही है। लेकिन उन्होने किसी दूसरे का कष्ट भगवान से स्वंय ही मांगा है तो उन्हे स्वयं ही भुगतना पडेगा। तो गुरू की ऐसी प्रकृति होती है। तो गुरू क्या है गुरू वह है जो दूसरो की समस्या को अपने सिर लेता है।
-तो कहने का अर्थ यह है। गुरू के स्थान पर रहने बाले लोग इतने कोमल हृदय हो जाते है कि वो अपना नुकसान करके दूसरो को फायदा दिलाते है। ऐसे लोग दूसरो की समस्या को अपने सिर ले लिया करते है। और अपनी इसी प्रकृति के कारण जीवन मे दुख उठाते है हालांकि समाज में उनके प्रति लोगो का सहानुभूति का भाव जरूर रहता है। लेकिन उनकें काम कोई नही आता।

0 Comments: